shayri dil se

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ ।
         
कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
       
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ

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 अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे
 "फराज़" क्यों तन्हा हो गए तेरे जाने के बाद |

यही सोच कर उस की हर बात को सच  मानते रहे हम
के इतने ख़ूबसूरत लव झूठ  कैसे बोलेंगे ।

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